आलेख : उत्कर्ष भारद्वाज
अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते
संकलन : जर्नलिस्ट अमरेश
संकट के किसी भी समय में पूंजी का सबसे पुराना तरीका होता है कि कोई झटका (शॉक) पैदा करो और मज़दूर वर्ग को उसे झेलने दो। ईंधन की कीमतों के साथ भी ऐसा ही होता है। जब भी वॉशिंगटन किसी पर बम गिराने का फ़ैसला करता है, तो इसकी कीमतें हमेशा की तरह बढ़ जाती हैं। 28 फरवरी, 2026 को बिना उकसावे के, ईरान पर अमेरिका के हमले ने खाड़ी क्षेत्र को एक ऐसी जंग में धकेल दिया है, जिसकी कीमत बाकी दुनिया को चुकानी पड़ रही है। इसके जवाब में तेहरान ने दुनिया के सबसे अहम ‘चोकपॉइंट’ (संकरे रास्ते) से होने वाले तेल परिवहन को रोक दिया।
यह वही संकरा रास्ता है, जिससे दुनिया का पांचवां हिस्सा कच्चा तेल और उससे भी ज़्यादा एलएनजी गुज़रता है। कच्चा तेल (ब्रेंट क्रूड), जिसकी कीमत पिछले दो सालों में ज़्यादातर समय 70 डॉलर के आसपास रही थी, अचानक तेज़ी से बढ़ गई। भारत में आने वाले कच्चे तेल का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा उसी जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) से आता था, जिससे तेल परिवहन अब बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। आज दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रूपये प्रति लीटर और डीज़ल 95.20 रूपये प्रति लीटर है। मई 2026 में देश भर में कीमतों में 3 रूपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी को “एडजस्टमेंट” (समायोजन) कहा गया। बताया गया कि ईरान पर अमेरिका-इज़राइल युद्ध के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण यह ज़रूरी हो गया था। इसका बिल अमेरिकी युद्ध योजनाकारों को नहीं, बल्कि भारतीय मज़दूरों को चुकाना पड़ रहा है — ईंधन, आवागमन, खाद और ट्रक से मंडी तक पहुँचने वाली सब्ज़ियों के महंगे होने के रूप में। जून में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई, खाद्य महंगाई दर 5.32 प्रतिशत के पार चली गई, और परिवहन महंगाई दर दोगुनी से ज़्यादा — मई में 1.75% से जून में 4.31% — हो गई। रोजगारविहीन “विकास” दर के एक दशक के दौरान ठहरी हुई वास्तविक मज़दूरी अब चुपचाप अपना दम तोड़ रही है।
अंडर-रिकवरी – जान-बूझकर दर्शाया गया नुकसान
सरकार का दावा है कि तेल विपणन कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है, जो कथित तौर पर रोज़ाना 1,000 करोड़ रूपये तक है। सरकार का यह भी कहना है कि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी इसलिए की गई, ताकि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को नुकसान न पहुंचे और वे अपनी कमाई का स्तर बनाए रख सकें। ईंधन की कीमतों में हर बढ़ोतरी के पीछे उनका तर्क ‘अंडर-रिकवरी’ पर आधारित है।अंडर-रिकवरी को समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि इसकी गणना कैसे की जाती है। हममें से कई लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि यह रिफ़ाइनरी (शोधन संयंत्र) द्वारा कच्चे तेल के लिए चुकाई गई कीमत और पंप पर होने वाली कमाई के बीच का अंतर है। लेकिन अगर ऐसा होता, तो यह एक वास्तविक और ऑडिट किया जा सकने वाला नुकसान होता। अंडर-रिकवरी असल में घरेलू बिक्री मूल्य और ‘इंपोर्ट पैरिटी प्राइस’ (आयात समता मूल्य) के बीच का अंतर है। आसान शब्दों में कहें तो, अगर उसी ईंधन को पूरी तरह से प्रसंस्कृत करके किसी खाड़ी देश के बंदरगाह से आयात किया जाए, तो उस पर माल-भाड़ा, बीमा, कस्टम ड्यूटी वगैरह मिलाकर जो काल्पनिक लागत आएगी, वही आयात समता मूल्य है। अगर यह बेंचमार्क बढ़ती है और पंप पर ईंधन की कीमत उसके बराबर नहीं बढ़ाई जाती, तो तेल विपणन कंपनियां इसे “नुकसान” घोषित कर देती हैं, भले ही उस कीमत पर वास्तव में एक लीटर ईंधन भी आयात न किया गया हो। भारतीय तेल शोधक (रिफ़ाइनर) लंबे समय से संविदा-आयात और स्पॉट कार्गो के मिश्रण को प्रसंस्कृत कर रहे हैं। इनमें से ज़्यादातर सामान होर्मुज़ में रुकावट आने से काफ़ी पहले ही खरीद लिया गया था। साथ ही, कुछ घरेलू कच्चे तेल का भी शोधन किया जाता है, जिस पर लंबी दूरी का माल-भाड़ा या युद्ध-जोखिम प्रीमियम नहीं लगता। जब तक वॉशिंगटन ने रोज़नेफ़्ट और लुकऑइल पर प्रतिबंध लगाकर रिफ़ाइनरों को खरीद रोकने पर मजबूर नहीं किया, तब तक वे ब्रेंट की तुलना में भारी छूट पर खरीदे गए रूसी कच्चे तेल का भी इस्तेमाल करते थे। वह छूट, वह कीमत या वह सुरक्षा —इनमें से कुछ भी बताए जा रहे “नुकसान” के आंकड़ों में नहीं दिखता। इसलिए, यह बहु-प्रचारित नुकसान सिर्फ़ कागज़ी है ; इसकी गणना उस बिल के आधार पर की गई है, जिसका भुगतान किसी ने नहीं किया है। गौर करने वाली बात यह है कि जब सरकार तेल विपणन कंपनियों की बैलेंस शीट को, विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में कटौती के जरिए, बचाना चाहती है, तो वह इस काल्पनिक आंकड़े को अहम मानती है ; लेकिन जब मामला इसके उलट होता है, तो वह ज़ोर देती है कि उस काल्पनिक फ़ॉर्मूले का बोझ ग्राहकों पर पड़ना चाहिए।
वास्तव में फ़ायदा किसे होता है?
केंद्र सरकार ने ‘अंडर-रिकवरी फ़ॉर्मूला’ से जो संकट खड़ा किया है, उसके ज़रिए वह अब खुद को मजबूर और बेबस दिखाने की कोशिश कर रही है। वह ऐसा दिखावा कर रही है कि अगर कीमतें नहीं बढ़ाई गईं, तो आईओसीएल, बीपीसीएल, एचपीसीएल जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न कंपनियाँ अपने ही वित्तीय बोझ के नीचे दबकर बर्बाद हो जाएँगी। लेकिन जब हम यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि इस तरह इकट्ठा किया गया पैसा जाता कहां है, तो कहानी का रूप ही बदल जाता है। पेट्रोल और डीज़ल पर लगने वाले सिर्फ़ मूल आबकारी कर ही उस ‘विभाज्य पूल’ (बाँटे जाने वाले फंड) में जाती है, जिसे संविधान के तहत वित्त आयोग को राज्यों के साथ साझा करना होता है। इसके अतिरिक्त लगाये गए बाकी सभी कर — जैसे विशेष अतिरिक्त आबकारी कर, सड़क एवं अधोसंरचना सेस, कृषि अधोसंरचना सेस वगैरह — सीधे भारत सरकार की संचित निधि में चली जाती हैं। यह फंड पूरी तरह से केंद्र के नियंत्रण में होता है और इसमें से राज्य सरकारों को एक रुपया भी नहीं देना पड़ता। समय के साथ, केंद्र सरकार ने अपने बजट में ईंधन पर टैक्स लगाने के तरीके को इस तरह बदल दिया है कि साझा किए जाने वाले कर का हिस्सा कम हो गया है और न बाँटे जाने वाले (अविभाज्य) सेस का हिस्सा बढ़ गया है। इस तरह, वित्तीय केंद्रीकरण ‘सहकारी संघवाद’ पर धीरे-धीरे चोट करता है। अगर ‘अंडर-रिकवरी’ का मकसद वास्तव में आईओसीएल, बीपीसीएल, एचपीसीएल को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए रखना है, तो सरकार इन कंपनियों को सब्सिडी दे सकती है और खुदरा कीमतों को वास्तविक लागत के करीब आने दे सकती है। सरकार के अपने आंकड़े बताते हैं कि आयात समता मूल्य को हटा देने पर ऐसा करना आसानी से मुमकिन है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं करती, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की पंप की कीमतें अगर वास्तविक लागत के हिसाब से तय हों, तो इससे निजी कंपनियों के एक छोटे, लेकिन बहुत ताकतवर समूह को खतरा हो सकता है। इस समूह में रिलायंस का जामनगर कॉम्प्लेक्स (दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट रिफाइनरी) और नायरा एनर्जी (पुरानी एस्सार ऑयल की उत्तराधिकारी) शामिल हैं। ये दोनों ही कंपनियां भारतीय बाजार के बजाय निर्यात-उन्मुख मार्जिन से असली कमाई करती हैं। सरकार द्वारा उठाए गए हाल के कदमों से उसकी असली मंशा साफ़ हो जाती है। मार्च में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 75% की बढ़ोतरी को देखते हुए, वित्त मंत्रालय ने विशेष अतिरिक्त आबकारी कर में 10 रूपये प्रति लीटर की कटौती की (जिससे सालाना 1.5 लाख करोड़ रूपये से ज़्यादा का राजस्व नुकसान हुआ), ताकि तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन को बचाया जा सके। दो महीने बाद, जब कच्चे तेल की कीमतों का दबाव बना हुआ था, उसी सरकार को आम यात्रियों और किसानों पर 3 रूपये प्रति लीटर की और बढ़ोतरी का बोझ डालना ज़रूरी लगा। ये दोनों फ़ैसले दिखाते हैं कि केंद्र सरकार तेल कंपनियों के मुनाफ़े को बचाने के लिए तो अपना हिस्सा छोड़ देगी, लेकिन किसी ऐसे युद्ध का झटका सरकारी खजाने पर नहीं पड़ने देगी, जिसे उसने शुरू नहीं किया था ; इसके बजाय वह यह बोझ आम लोगों पर डाल देगी। भारत की निजी तेल शोधक कंपनियाँ मुख्य रूप से सस्ते कच्चे तेल (जैसे वॉशिंगटन की पाबंदियों से पहले काम कीमत पर मिलने वाला रूसी ‘यूराल्स’ तेल या खाड़ी देशों से मौके पर खरीदा गया तेल) को प्रसंस्कृत उत्पाद में बदलकर और उन्हें विदेशों में युद्ध के कारण बढ़े हुए मार्जिन पर बेचकर मुनाफा कमा रही हैं। जब होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात मुश्किल हुए और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डीज़ल और जेट-फ्यूल की कीमतें तेज़ी से बढ़ीं, तो रिलायंस और नायरा ने घरेलू बाज़ार में आपूर्ति करने के बजाय निर्यात करके पूरा व्यावसायिक मुनाफा कमाया। देश में ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने डीज़ल पर 21.50 रूपये प्रति लीटर और विमानों के ईंधन पर 29.50 रूपये प्रति लीटर का निर्यात लेवी (कर) लगाया। इस लेवी से केवल उस ऊँची, फ़ॉर्मूले पर आधारित कीमत पर आपूर्ति सुनिश्चित हुई, जो ग्राहकों से पहले ही ली जा रही थी, और इसने भारतीयों को कम कीमत (डिस्काउंट) पर बेचने के लिए, निजी पंपों को मजबूर करने के लिए कुछ भी नहीं किया। एक जैसी, ऊंची और स्वतंत्र विद्युत उत्पादक (आईपीपी) बेंचमार्क वाली खुदरा कीमत ही इस पूरी कवायद का मुख्य आधार है। अगर इंडियन ऑयल या भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियाँ वास्तविक घरेलू लागत के अनुसार, कीमतें तय करने लगें, तो निजी पंप अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता खो देंगे। साथ ही, नायरा और रिलायंस का खुदरा नेटवर्क खत्म हो जाएगा और उनके शोधन मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा भी जाता रहेगा। तेल की कीमतों को विनियमन से हटाने का सीधा-सा मतलब है कि सरकार उपभोक्ताओं को सुरक्षा देने के बजाय बड़े पूंजीपतियों का मजबूती से साथ दे रही है। इससे एक ऐसी न्यूनतम कीमत तय हो जाती है, जिससे निजी शोधक सबसे अच्छा माल (क्रीम) तो निर्यात कर सकते हैं और बचा हुआ माल (स्किम्ड मिल्क) भारतीयों को क्रीम वाली कीमत पर बेच सकते हैं। यह समझना मुश्किल नहीं है कि सार्वजनिक क्षेत्र तो बस कैमरों के सामने पेश किया जाने वाला उदाहरण है, जबकि असली फायदा जामनगर और वाडिनार में मौजूद निजी कंपनियों को ही मिलता है।
घुटने टेकती विदेश नीति
सालों पहले, जब वॉशिंगटन ने प्रतिबंधों का दबाव बनाया, तो भारत ने ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया था। इस प्रक्रिया में भारत ने रुपये में भुगतान करने का वह तरीका भी छोड़ दिया, जिसने नई दिल्ली को डॉलर और टैंकरों की निर्भरता वाली मुश्किल स्थिति से बचा रखा था। हाल ही में, जब वॉशिंगटन ने रोसनेफ्ट और लुकऑयल पर प्रतिबंध लगाए और मौजूदा टैरिफ के ऊपर पच्चीस प्रतिशत का अतिरिक्त “रूस पेनल्टी” लगा दिया, तो रिलायंस ने समय-सीमा खत्म होने से कुछ दिन पहले ही जामनगर में रूसी कच्चे तेल की खरीद रोक दी ; सरकारी संयंत्रों ने भी ऐसा ही किया। रियायती दरों पर मिलने वाला रूसी तेल, जो कुछ ही सालों में मामूली मात्रा से बढ़कर कुल आयात का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बन गया था, उसे अचानक अमेरिकी साम्राज्यवाद की मर्जी के आगे रातों-रात छोड़ दिया गया — और ऐसा उस कमज़ोर सरकार की वजह से हुआ, जो अमेरिकी इच्छा के आगे झुक गई। रूस के यूराल क्रूड बैरल होर्मुज़ जलडमरूमध्य के तनाव वाले इलाके से बाहर खरीदे जाते हैं और खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के जोखिम के कारण लगने वाले अतिरिक्त शुल्क (रिस्क प्रीमियम) से बचे रहते हैं। इससे भी ज़रूरी बात यह है कि वे कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता का एक अहम विकल्प देते हैं, जो भारत को इस झटके से बचा सकता था। इस झटके के आने से कुछ महीने पहले अमेरिकी दबाव में आकर इस विविधता को खत्म कर दिया गया। एक स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को कम लागत वाले और कच्चे तेल के अलग-अलग तरह के स्रोतों को खुला रखना चाहिए था, ताकि खाड़ी में युद्ध कभी भी हमारी अर्थव्यवस्था को बंधक न बना सके। इसके बजाय, जो सरकार खुद को सभ्यता के लिहाज़ से मज़बूत और मुखर बताती है, वह टैरिफ की पहली धमकी पर ही झुक गई ; उसने पहले ईरान और फिर रूस से तेल लेना बंद कर दिया, और अब वह उम्मीद करती है कि उसकी अपनी कूटनीतिक हार और हिम्मत की कमी की कीमत भारत की जनता पेट्रोल पंप पर चुकाए।
आगे क्या?
इनमें से किसी भी चीज़ को भारत में पूंजीवाद के नव-उदारवादी दौर के उस व्यापक ढांचे से अलग नहीं किया जा सकता, जहाँ जनता का जोखिम निजी मुनाफ़े से जुड़ा है, नाममात्र की संप्रभुता वास्तविक अधीनता के साथ जुड़ी है, और नियमों में ढील की बातें वास्तव में एकाधिकार के लिए फिर से नियम बनाने के रोज़मर्रा के व्यवहार के साथ जुड़ी हैं। जिस तरह हर युद्ध यह साफ़ कर देता है कि कोई राज्य असल में किसकी सुरक्षा के लिए बनाया गया था, उसी तरह होर्मुज़ जलडमरूमध्य का संकट भी इसी समस्या से जुड़े ढांचे को उजागर कर रहा है।
इस संकट से जो मांगें उठनी चाहिए, उनमें शामिल हैं :
ईंधन की कीमतों का फिर से नियमन करना ; इसे काल्पनिक आयात समता फ़ॉर्मूला’ से अलग करना ; और खुदरा कीमतों को उस कच्चे तेल की वास्तविक, मिश्रित लागत पर आधारित करना, जिसे भारतीय शोधक असल में प्रसंस्कृत करते हैं। ‘विभाज्य पूल’ (बांटे जाने योग्य फंड) की सेस-आधारित लूट को रोकना और राज्यों को ईंधन से होने वाली कमाई में उनका संवैधानिक हिस्सा वापस देना, न कि उन्हें मुआवज़े के लिए केंद्र सरकार के सामने गिड़गिड़ाने के लिए छोड़ देना। रिलायंस और नायरा के ‘विंडफ़ॉल’ (अचानक भारी मुनाफ़े) और ‘क्रैक-स्प्रेड सुपर-प्रॉफ़िट’ (इसमें तेल शोधक कंपनियों का मार्जिन कई गुना बढ़ जाता है) पर सीधे स्रोत पर टैक्स लगाना, न कि निर्यात शुल्क पर निर्भर रहना, जो वास्तविक लूट को प्रभावित किए बिना सिर्फ़ आपूर्ति का रास्ता बदल देते हैं। और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को आम जनता की भलाई के लिए फिर से लगाना, न कि किसी साम्राज्यवादी युद्ध में निजी शोधकों के लिए ‘शॉक एब्ज़ॉर्बर’ (झटका सहने वाले) के तौर पर इस्तेमाल करना — एक ऐसा युद्ध, जिसका भारत की मेहनतकश जनता ने कभी समर्थन नहीं किया और जिससे ‘बिग ऑयल’ (बड़ी तेल कंपनियों) ने कभी मुनाफ़ा कमाना बंद नहीं किया। यह वह न्यूनतम चीज़ है, जो किसी भी सरकार को उन लोगों के लिए करनी चाहिए, जिन्हें दूसरों द्वारा लड़े गए युद्ध और कुछ लोगों द्वारा कमाए गए मुनाफ़े के लिए दो-दो बार कीमत चुकानी पड़ती है।
(लेखक शोध अध्येता हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)








