रिपोर्ट : पटना डेस्क
राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के तहत पंचायतों और वार्डों के नए सिरे से परिसीमन (डेलीमिटेशन) की कवायद शुरू कर दी गई है
न्यूज़ डेस्क, ए.एल.न्यूज़
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पटना, (विशेष ब्यूरो)। बिहार में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत आम चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही गांवों की सियासत और प्रशासनिक तैयारियों ने रफ्तार पकड़ ली है। चुनाव भले ही अभी दूर हो, लेकिन पंचायतों के नए सियासी समीकरण बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के तहत पंचायतों और वार्डों के नए सिरे से परिसीमन (डेलीमिटेशन) की कवायद शुरू कर दी गई है। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद कई पंचायतों और वार्डों की सीमाएं बदल सकती हैं और इसके साथ ही कई संभावित उम्मीदवारों के चुनावी क्षेत्र भी बदल जाएंगे। इस बार परिसीमन का आधार वर्ष 2011 की जनगणना के आधिकारिक आंकड़े होंगे। जनसंख्या के आधार पर पंचायतों, निर्वाचन क्षेत्रों और वार्डों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण किया जाएगा। ऐसे में जिस गांव या पंचायत में आबादी का अनुपात बदला है, वहां निर्वाचन क्षेत्र के स्वरूप में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।
7 हजार की आबादी पर मुखिया और सरपंच का क्षेत्र
प्रस्तावित प्रशासनिक मानकों के अनुसार करीब 7,000 की आबादी पर एक मुखिया और इतनी ही जनसंख्या पर एक सरपंच का निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित करने की तैयारी है। इसी तरह करीब 5,000 की आबादी पर एक पंचायत समिति सदस्य और लगभग 50,000 की आबादी पर एक जिला परिषद सदस्य का निर्वाचन क्षेत्र तय किए जाने का प्रस्ताव है। हालांकि, इन मानकों के आधार पर वास्तविक निर्वाचन क्षेत्रों का अंतिम स्वरूप परिसीमन की पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। स्थानीय भौगोलिक स्थिति, गांवों की बसावट और जनसंख्या के वितरण को भी ध्यान में रखा जाएगा।
कहीं बढ़ेंगे वार्ड तो कहीं हो सकता है विलय
परिसीमन का सबसे बड़ा असर पंचायतों और वार्डों के मौजूदा स्वरूप पर पड़ने की संभावना है। जनसंख्या के नए अनुपात के आधार पर कई पंचायतों का विखंडन या पुनर्गठन हो सकता है। अधिक आबादी वाले क्षेत्रों में नए वार्ड बनाए जाने की स्थिति बन सकती है, जबकि कम आबादी वाले छोटे वार्डों का दूसरे वार्डों में विलय भी संभव है। यानी परिसीमन के बाद सिर्फ पंचायत की सीमा ही नहीं बदलेगी, बल्कि कई जगहों पर वार्ड की चौहद्दी, मतदाताओं का क्षेत्र और संभावित प्रत्याशियों का चुनावी गणित भी बदल सकता है। ग्रामीण इलाकों में इसका असर अभी से दिखाई देने लगा है। जिन इलाकों में लंबे समय से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे संभावित प्रत्याशी हैं, उनकी नजर अब परिसीमन की अंतिम सूची पर टिकी है। वजह साफ है—जिस सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी हो रही है, संभव है परिसीमन के बाद वही क्षेत्र किसी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में शामिल हो जाए।
परिसीमन के बाद नया आरक्षण रोस्टर
पंचायतों का नया नक्शा तैयार होने के बाद चुनावी राजनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। परिसीमन पूरा होने के बाद आरक्षण रोस्टर भी नए सिरे से तैयार किया जाएगा। अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) और महिलाओं के लिए आरक्षण के प्रावधानों के अनुसार पदों का आवंटन किया जाएगा। इसके साथ ही सीटों का रोटेशन भी किया जाएगा। इसका मतलब है कि जिस पंचायत या वार्ड में पिछली बार कोई विशेष श्रेणी की सीट थी, जरूरी नहीं कि अगली बार भी वही सीट उसी श्रेणी के लिए आरक्षित रहे। यही वजह है कि परिसीमन के बाद कई मौजूदा जनप्रतिनिधियों का चुनावी समीकरण बदल सकता है। किसी सामान्य सीट के आरक्षित होने और आरक्षित सीट के सामान्य होने की स्थिति में दावेदारों का पूरा गणित बदल जाएगा। महिलाओं के आरक्षण के कारण भी कई सीटों पर नए चेहरों को मौका मिलने की संभावना रहेगी।
वोटर लिस्ट से बूथ तक बदलेंगे कई समीकरण
पंचायत चुनाव की तैयारी सिर्फ परिसीमन और आरक्षण तक सीमित नहीं रहेगी। निर्वाचन क्षेत्रों का अंतिम निर्धारण होने के बाद बूथवार मतदाता सूची का विखंडन किया जाएगा। इसके अलावा मतदान केंद्रों की भौतिक स्थिति की जांच, नए मतदान केंद्रों का गठन और आवश्यकतानुसार केंद्रों में बदलाव जैसी प्रक्रियाएं भी पूरी करनी होंगी।


