रिपोर्ट : छपरा डेस्क
एजुकेशन लीडरशिप में शोध के लिए 2026-27 बैच में भारत से चुने गए इकलौते शोधार्थी, बहुभाषी एवं समावेशी शिक्षा पर करेंगे शोध
न्यूज़ डेस्क, ए.एल. न्यूज़
– अमिट लेख
छपरा, (सारण)। कहते हैं कि परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि हौसले बुलंद हों और मेहनत के प्रति ईमानदारी हो तो सफलता की राह खुद बन जाती है। सारण जिले के एक ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर अमेरिका तक का सफर तय करने वाले नीरज कुमार सिंह ने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर ऐसा ही उदाहरण पेश किया है।

अपनों की उपेक्षा और समाज के तानों को पीछे छोड़ते हुए नीरज ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। नीरज ने अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स लोवेल में 24 अगस्त 2026 से ‘एजुकेशन लीडरशिप’ विषय में पीएचडी शोध की शुरुआत की है। खास बात यह है कि 2026-27 बैच में इस कार्यक्रम के लिए चयनित कुल 60 शोधार्थियों में नीरज भारत से चुने गए इकलौते शोधार्थी हैं।
अपनों की उपेक्षा से अमेरिका तक का सफर :
नीरज की सफलता की कहानी संघर्ष, आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति की मिसाल है। सारण के सुदूर ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर उन्होंने अपनी शैक्षणिक यात्रा को लगातार आगे बढ़ाया और अंततः अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी तक पहुंचे।

प्रोफेसर बनने का सपना संजोए नीरज ने बताया कि उनके 2026-27 बैच में कुल 60 शोधार्थी हैं। भारत से इस बैच में उनका चयन अकेले हुआ है। उनके अनुसार, यह उपलब्धि उनके लिए व्यक्तिगत सफलता के साथ-साथ बिहार और भारत के लिए भी गौरव का विषय है।
2.6 करोड़ रुपये की पूरी तरह वित्तपोषित छात्रवृत्ति :
नीरज को यूनिवर्सिटी की ओर से लगभग 2.6 करोड़ रुपये की पूरी तरह वित्तपोषित छात्रवृत्ति प्रदान की गई है। इस छात्रवृत्ति में ट्यूशन फीस की पूरी माफी के साथ स्वास्थ्य बीमा और नियमित छात्रवृत्ति भी शामिल है। इससे उनके रहने, पढ़ाई और शोध से जुड़े खर्चों का प्रबंध हो सकेगा। अमेरिका पहुंचने से पहले भी नीरज की शैक्षणिक उपलब्धियों का सफर काफी उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया, मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, चेन्नई के राजीव गांधी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ यूथ डेवलपमेंट तथा जय प्रकाश विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है।
अमेरिकी विद्यार्थियों को पढ़ाने की भी मिली जिम्मेदारी :
नीरज की उपलब्धि केवल पीएचडी में प्रवेश और छात्रवृत्ति तक सीमित नहीं है। उनकी अकादमिक क्षमता को देखते हुए उन्हें शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए यूनिवर्सिटी में टीचिंग असिस्टेंट के रूप में भी नियुक्त किया गया है।

इस भूमिका में वे स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों के अकादमिक कार्यों में सहयोग करेंगे। यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ एजुकेशन की ओर से उन्हें विशेष रिसर्च वर्कस्पेस भी उपलब्ध कराया गया है।
बहुभाषी और समावेशी शिक्षा पर करेंगे शोध :
नीरज का शोध विषय भी सामाजिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। वे बहुभाषी शिक्षा, शिक्षा में समानता और समावेशी शिक्षा जैसे मुद्दों पर शोध कर रहे हैं।
उनका प्रयास ऐसे शैक्षिक मॉडल की परिकल्पना करना है, जिसमें भाषा, सामाजिक स्थिति अथवा अन्य परिस्थितियों के कारण कोई भी बच्चा शिक्षा की मुख्यधारा से पीछे न छूटे। उनका शोध शिक्षा व्यवस्था को अधिक समान, समावेशी और अवसरपरक बनाने की दिशा में केंद्रित है।
सफलता का श्रेय गुरुजनों और सहयोगियों को दिया :
अपनी इस उपलब्धि का श्रेय नीरज ने अपने सभी प्रोफेसरों, मेंटर्स, मित्रों, सहयोगियों और उन सभी लोगों को दिया है, जिन्होंने उनकी उच्च शिक्षा की यात्रा में उनका मार्गदर्शन किया, सहयोग दिया और कठिन परिस्थितियों में उनका हौसला बढ़ाया।
नीरज की यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार और सारण के लिए गौरव का विषय है, बल्कि बिहार के उन युवाओं के लिए भी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि संघर्ष चाहे जितना बड़ा हो, प्रतिभा, मेहनत और दृढ़ संकल्प के सामने कोई भी बाधा स्थायी नहीं होती।


