आलेख : आर्या सुरेश
अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते
संकलन : जर्नलिस्ट अमरेश
– अमिट लेख
अगस्त 2025 में संसद में तीन विधेयक एक साथ पेश किए गए, और अगर उन्हें अलग-अलग देखा जाए, तो वे लगभग तकनीकी लगते हैं। संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 इस बात से संबंधित है कि अगर किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को गिरफ्तार किया जाता है, तो क्या होगा। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 और केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025 इसी बात को अन्य केंद्र शासित प्रदेशों पर भी लागू करते हैं। लेकिन विपक्ष और संविधान विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर इन तीनों विधेयकों को एक साथ पढ़ा जाए, तो इनका असर सामान्य प्रशासनिक कानूनों से कहीं ज़्यादा बड़ा है : यह भारत में चुनी हुई सरकारों को कैसे और किसके द्वारा हटाया जा सकता है, इस पूरी प्रक्रिया को ही बदलने जैसा है।
इन तीनों विधेयकों के केंद्र में एक ही तरीका है। अगर किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को ऐसे आरोप में लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, जिसमें 5 साल या उससे ज़्यादा की सज़ा हो सकती है, तो उस व्यक्ति को इस्तीफ़ा देना होगा। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उनका पद अपने आप खाली मान लिया जाएगा। इसके लिए दोषी ठहराए जाने की ज़रूरत नहीं है, न ही आरोप पत्र दाखिल करने की ज़रूरत है, और न ही किसी अदालत द्वारा सबूतों की जांच करने की ज़रूरत है।
खतरे के संकेत
सरकार ने इन बदलावों का बचाव करते हुए कहा है कि ये राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ एक कदम है और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की दिशा में उठाए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि इसका मकसद ऐसे नेताओं को ऊंचे पदों पर बने रहने से रोकना है, जिन पर गंभीर आरोप हैं। लेकिन विपक्षी पार्टियों और कानून के जानकारों का कहना है कि इन विधेयकों का मसौदा जिस तरह तैयार किया गया है, उससे वह मकसद पूरा नहीं होगा, जिसे वे ठीक करने का दावा करते हैं ; बल्कि जवाबदेही मजबूत करने के बजाय, ये विधेयक चुनी हुई सरकार का नेतृत्व कौन करेगा, इसका फैसला उस पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी के हाथ में सौंप देते हैं, जो गिरफ्तारी करती है। भारत की शासन व्यवस्था एक सीधी-सी बात पर टिकी है : कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री इसलिए अपने पद पर बना रहता है, क्योंकि उसे निर्वाचित सदन का विश्वास प्राप्त है, और उसे तभी हटाया जा सकता है, जब वह सदन का विश्वास खो दे। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस संसदीय स्वरूप को संविधान के “मूल ढांचे” का हिस्सा माना है — एक ऐसी मुख्य विशेषता, जिसे संविधान में संशोधन करके भी नहीं बदला जा सकता। यह सिद्धांत सबसे पहले 1973 के ऐतिहासिक ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ के मामले में निरूपित किया गया था।
लोकतंत्र को कमज़ोर करना
130वां संशोधन विधेयक इस सिद्धांत को दरकिनार करते हुए किसी निर्वाचित सरकार को हटाने का एक ऐसा रास्ता बनाता है, जिसका विश्वास मत से कोई लेना-देना नहीं है। सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के तहत, भारत में गिरफ़्तार किसी व्यक्ति को चौबीस घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता है, लेकिन उस शुरुआती चरण में मजिस्ट्रेट सिर्फ़ यह देखता है कि गिरफ़्तारी सही प्रक्रिया से हुई है या नहीं, न कि सबूतों की जांच करता है। किसी मामले की असलियत की अदालती जांच किए बिना, न्यायिक हिरासत की अवधि तीस दिन से ज़्यादा समय तक बढ़ सकती है, और आरोपी के डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार आम तौर पर अपराध के आधार पर साठवें या नब्बेवें दिन तक नहीं बनता है। अदालत आम तौर पर, आरोप तय होने तक, आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सबूत हैं या नहीं, इस पर कोई राय नहीं बनाती है ; यह चरण और भी बाद में आता है। इसका मतलब है कि विधेयक द्वारा तय की गई तीस दिन की समय-सीमा प्रक्रिया के उस बिंदु पर आती है जब, जैसा कि कानूनी जानकार बताते हैं, न्याय प्रणाली ने अभी तक मामले के सही होने पर किसी भी तरह से विचार नहीं किया होता है।
बचने का रास्ता
इस विधेयक का दायरा सिर्फ़ सबसे ऊँचे पद तक ही सीमित नहीं है। यह विधेयक हर सामान्य मंत्री पर भी वही ‘अपने-आप पद से हटाने’ वाला नियम लागू करता है। आलोचकों का कहना है कि यह नियम 2014 के सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले (मनोज नरूला बनाम भारत सरकार) के सीधे ख़िलाफ़ है, जिसमें कहा गया था कि मंत्री परिषद में कौन शामिल होगा, यह तय करना पूरी तरह से प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का अधिकार है। एक और बात पर इस विधेयक की ख़ास तौर पर आलोचना हो रही है : इस विधेयक के तहत हटाए गए मंत्री को हिरासत से रिहा होते ही दोबारा नियुक्त किया जा सकता है, और इसके लिए यह ज़रूरी नहीं है कि उनके ख़िलाफ़ चल रहे मामले का पहले निपटारा हो। विपक्ष का तर्क है कि यह बात सरकार के अपने ही तर्क को कमज़ोर करती है ; अगर मकसद सच में संदिग्ध ईमानदारी वाले लोगों को पद से दूर रखना होता, तो किसी कोर्ट का फ़ैसला आने से पहले ही उन्हें उसी पद पर तुरंत वापस आने की इजाज़त देने का कोई अर्थ नहीं है। दोबारा नियुक्ति वाला नियम बताता है कि इस विधेयक का असली मकसद नैतिकता लागू करना नहीं, बल्कि जाँच एजेंसी को सरकार के गठन पर कुछ समय के लिए दबाव बनाने का अधिकार देना है, जिसका इस्तेमाल एजेंसी अपनी मर्ज़ी से कर सकती है।
सत्ता की गतिकी (पावर डायनामिक्स) में बदलाव
एक और संवैधानिक सिद्धांत, जिसे ये विधेयक प्रभावित करते हैं, वह है स्थायी नौकरशाही (जिसमें जांच एजेंसियां भी शामिल हैं) और चुनी हुई राजनीतिक कार्यपालिका (जिसका काम नौकरशाही की निगरानी करना है) के बीच शक्तियों का बंटवारा। दिल्ली प्रशासन पर 2023 के एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने “जवाबदेही की तीन-स्तरीय कड़ी” का ज़िक्र किया था, जो नागरिक सेवाओं से शुरू होकर राजनीतिक कार्यपालिका और विधायिका से होते हुए आखिरकार मतदाताओं तक जाती है। आलोचकों का कहना है कि 130वां संशोधन विधेयक इस कड़ी को उलट देता है : एक जांच एजेंसी, जो स्थायी कार्यपालिका का हिस्सा है, को उस चुनी हुई सरकार का कार्यकाल खत्म करने की शक्ति मिल जाती है, जिसके प्रति उसे जवाबदेह होना चाहिए।
संघवाद पर हमला
इसमें संघवाद का पहलू भी शामिल है। चूंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी केंद्रीय एजेंसियां केंद्र सरकार के मंत्रालयों के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करती हैं, इसलिए यह विधेयक असल में नई दिल्ली को किसी ऐसी राज्य सरकार को हटाने का ज़रिया देता है, जो उसे असुविधाजनक लगती है — इसके लिए उसे बस गिरफ्तारी का आदेश देना होगा। कागज़ पर यह विधेयक दोनों पक्षों के लिए एक जैसा लगता है — सैद्धांतिक रूप से राज्य की पुलिस भी प्रधानमंत्री को हटा सकती है — लेकिन यह बराबरी सिर्फ़ दिखावे की है। असल में, किसी भी राज्य की पुलिस की तुलना में केंद्रीय एजेंसियों की पहुंच और संसाधन कहीं ज़्यादा बड़े हैं। साथ ही, हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि केंद्रीय एजेंसियां विपक्ष द्वारा शासित राज्यों पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देती रही हैं। बाकी दो विधेयक, चुनी हुई विधानसभाओं वाले भारत के केंद्र-शासित प्रदेशों पर भी इसी तरह की व्यवस्था लागू करते हैं। जम्मू-कश्मीर में, जिसका 2019 में पूर्ण राज्य का दर्जा खत्म हो गया था और जहाँ हाल ही में चुनी हुई विधानसभा बहाल हुई है, वहाँ हटाने का फ़ैसला उप-राज्यपाल (लेफ्टिनेंट गवर्नर) का होगा। उप-राज्यपाल केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और उनके पास उस इलाके में पहले से ही काफी स्वतंत्र अधिकार होते हैं। विपक्ष के नेताओं का तर्क है कि इससे जम्मू-कश्मीर में जो सीमित स्व-शासन की व्यवस्था है, वह और भी सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्रालय के नियंत्रण में आ जाएगी। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब सालों के केंद्रीय शासन के बाद वहाँ के लोगों ने फिर से मताधिकार का प्रयोग करना शुरू किया है। विधेयक के संबंधित प्रावधान के तहत, अगर मुख्यमंत्री किसी मंत्री के खिलाफ 31वें दिन तक कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, तो मंत्री को अपने-आप हटा दिया जाएगा। इससे मुख्यमंत्री के पास अपने सहयोगी को चुनने का जो अधिकार होता है — जिसे अदालतों ने दूसरी जगहों पर मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार माना है — वह भी छिन जाएगा। पुडुचेरी, जो चुनी हुई सरकार वाला दूसरा केंद्र-शासित प्रदेश है, वहाँ इस विधेयक के तहत किसी मंत्री को हटाने की प्रक्रिया राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिमंडल की सलाह पर या सलाह न मिलने पर अपने-आप पूरी होती है। चूँकि इस मामले में राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं, इसलिए इसका व्यावहारिक असर जम्मू-कश्मीर के प्रावधान जैसा ही होता है, जिसमें असली फ़ैसला लेने की शक्ति केंद्र सरकार के पास होती है। पुडुचेरी की मौजूदा सरकार के अलावा, विरोधी पक्ष की चेतावनी है कि यह विधेयक भविष्य में निर्वाचित विधानसभा वाले किसी भी केंद्र-शासित प्रदेश के लिए एक मॉडल तय करता है, जिसमें शुरू से ही केंद्र के दखल की व्यवस्था शामिल है। अगर हर विधेयक को अलग-अलग देखा जाए, तो कहा जा सकता है कि वे किसी छोटी-मोटी प्रक्रियात्मक कमी को दूर कर रहे हैं। लेकिन अगर उन्हें एक साथ देखा जाए, तो वे एक ऐसी समरूप व्यवस्था बनाते हैं, जो देश के हर निर्वाचित कार्यपालिका के पद पर लागू होती है – प्रधानमंत्री से लेकर पुडुचेरी के मंत्रियों तक। इन सभी को एक ही तरह की 30 दिन की गिरफ्तारी और हिरासत वाली प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिसे जांच एजेंसी अपनी मर्ज़ी से शुरू कर सकती है, और इसके लिए कोर्ट से किसी बात की पुष्टि करने की भी ज़रूरत नहीं होती। इस नज़रिए से देखें, तो किसी भी निर्वाचित सरकार के पास खुद को बचाने का कोई तरीका नहीं होगा, क्योंकि हटाने की प्रक्रिया शुरू करने की ताकत उन एजेंसियों के पास है, जो मतदाताओं के बजाय केंद्र सरकार की कार्यपालिका के प्रति जवाबदेह हैं।
खतरनाक रास्ता
चिंता की एक और बात यह है कि इसके लिए किस तरह का कानूनी तरीका अपनाया जा रहा है। चूंकि ये बदलाव सामान्य कानूनों के बजाय संविधान संशोधन के रूप में किए जा रहे हैं, इसलिए इनके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत होगी। लेकिन एक बार पारित पास हो जाने के बाद, इन्हें सामान्य कानून की तुलना में बदलना ज़्यादा मुश्किल होगा, क्योंकि यह व्यवस्था खुद संविधान का हिस्सा बन जाएगी और भविष्य में इसमें सुधार के लिए मुख्य रूप से अदालतों और संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत पर निर्भर रहना पड़ेगा।
सरकार का हद से ज़्यादा दखल
विपक्षी पार्टियों ने तीनों विधेयकों को वापस लेने की मांग की है। उनका तर्क है कि अगर मकसद सच में राजनीति के अपराधीकरण से निपटना है, तो इसके लिए कम कठोर तरीके भी मौजूद हैं, जैसे : फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट, मुकदमों के लिए कानूनी समय-सीमा तय करना, और गिरफ्तारी के बजाय दोषी ठहराए जाने पर अयोग्य घोषित करना। इन तरीकों से ‘बेगुनाह माने जाने’ के अधिकार की रक्षा भी होगी और जवाबदेही भी तेज़ी से तय हो सकेगी। सरकार ने विधेयक वापस लेने का कोई संकेत नहीं दिया है। जैसे-जैसे यह कानून संसद में आगे बढ़ेगा, भ्रष्टाचार-रोधी सुधार और सरकार के हद से ज़्यादा दखल के बीच की सीमा को लेकर बहस जारी रहने की संभावना है।
(लेखक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता और शोध अध्येता हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)








