रिपोर्ट : बेतिया डेस्क, उप-संपादक
गांधी का यहां आने और किसानों की बातों को गौर से सुनने और नीलहे पलांटरो द्वारा किसानों का दमन नजदीक से देखने के बाद नील की अमानवीय खेती से किसानों को मुक्ति मिली
न्यूज़ डेस्क, ए.एल.न्यूज़
– अमिट लेख
बेतिया, (मोहन सिंह)। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक से एक अविस्मरणीय पल आया जो भारतीय आजादी के आंदोलन को यादगार बना दिया। चम्पारण सत्याग्रह जिसने मोहन दास करम चन्द गांधी को महात्मा बना दिया और उनकी ख्याति राष्ट्रीय फलक तक ला दिया। जिसे गांधी खुद स्वीकार करते हुए लिखते हैं मुझे स्वीकार करना चाहिए कि वहां जाने से पहले मैं चंपारण का नाम तक नहीं जानता था। यहां नील की खेती होती है इसका ख्याल भी नहीं के बराबर ही था। नील की गोटियां देखी थी पर यह चंपारण में बनती है और इसके कारण हजारों किसानों को कष्ट झेलना पड़ता है, इसकी तनिक भी खबर नहीं थी। चंपारण में मुझे कोई पहचानता तक नहीं था किसान वर्ग बिलकुल अनपढ़ था यहां न कांग्रेस का नाम था न यहां कांग्रेस का कोई सदस्य दिखाई देता था। गांधी का यहां आने और किसानों की बातों को गौर से सुनने और नीलहे पलांटरो द्वारा किसानों का दमन नजदीक से देखने के बाद नील की अमानवीय खेती से किसानों को मुक्ति मिली। जब 1942 में गांधी ने अंग्रेजी निजाम के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा किया तब चम्पारण के किसानों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया । 24 अगस्त 1942 को जिला भर के स्वतंत्रता के दिवाने लोगों ने बेतिया स्थित तत्कालीन अनुमंडल कार्यालय पर भारतीय तिरंगा फहराने के लिए भारी जुलूस निकाला। हजारों लोग अपने अपने गांवों से तिरंगा हाथ में लिए बेतिया बड़ा रमना मैदान के लिए कुच किए जहां से जुलूम आगे बढ़ा। अंग्रेजी हुकूमत के कारिंदे भारी पुलिस बल के साथ आजादी के दिवानों को रोकने लगे । बताया जाता है अंग्रेज अधिकारी मिटर टॉमी ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने वालों पर गोली चलवाया जिसमें जगन्नाथ पुरी समेत 8 लोगों ने अपनी शहादत दिया। उन आठ शहीदों में एक 13 वर्षीय छात्र बैरिया के लौकरिया निवासी जगन्नाथपुरी अपने हम उम्र के लोगों के साथ साथ अन्य लोगों को भी 24 अगस्त को बेतिया चलने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। सुबह ही अपने साथियों के साथ लौकरिया से बेतिया के लिए निकल पड़े। रास्ते में लोगों ने अंग्रेजी निजाम द्वारा गोली-चलवाने का भय दिखाया जाता तो यही कहते कि “बेलभर के मुड़ी भले ना रही, पर देश त आजाद हो जाइ। यह इतनी कम उम्र में अंग्रेजी साम्राज्यवादी हुकूमत के खिलाफ और उनकी अन्याय के शासन के लिए बहुत बड़ा जज्बा था। इस जज्बा से वह अपने आप को रोक नही पाए। जब अंग्रेजी फौज ने निहत्ये देश वासियों पर गोलियां चलवाई तब जगन्नाथपुरी देशभक्तों पर गोली चलाने का आदेश देने वाले मिस्टर टॉमी पर पत्थल उछाल अंग्रेज़ अधिकारी को घायल कर दिया। अंग्रेजी फ़ौज की गोली उनके सीने पर लगी और वे शहीद हो गए। बताते है कि उनकी समाधी उनके पैतृक गांव लौकरिया में बनी। कुछ दिनों तक प्रति वर्ष वहां फूलमाला चढ़ा उनके संधी साथी उन्हें याद कर देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने का संकल्प लेते रहे। भाकपा माले नेता सुनील कुमार राव ने बताया कि आजादी के बाद उन्हे गुमनामी में ढ़केल दिया गया । 90 के दशक में उन्हे नई पीढ़ी द्वारा याद किया गया। और उनकी याद में साम्राज्यवाद के खिलाफ उनके जज्बे व उनकी यादगार को जिंदा रखने के लिए गांधी को चंपारण में लाने वाले राजकुमार शुक्ल के एक अनन्य सहयोगी रहे, अपने दरवाजे पर गांधी को बुलाकर किसानों की पहली सभा कराने वाले और निलहें पलांटरो के अत्याचार की जांच के लिए गांधी के नेतृत्व में बनी चंपारण एग्रेरियन कमिटी के समक्ष गवाही देने वाले लौकरिया निवासी बाबू खेंधर राव के पौत्र स्व. ब्रजराज राव द्वारा दिए गए जमीन दान पर ग्रामीणों के सहयोग से प्रतिमा का निर्माण हुआ। जहां 15 अगस्त,26 जनवरी को ग्रामीणों के सहयोग से अंचल प्रशासन द्वारा झण्डा फहराने के दौरान सलामी दिया जाता है। वहीं ग्रामीण 24 अगस्त को उनकी शहादत दिवस पर याद कर उन्हें श्रद्धा का पुष्प अर्पित करते है।








