400 साल से भी अधिक समय से आदिवासी समाज प्रकृति संरक्षण के प्रति गंभीर है और जिसे प्रतिवर्ष बरना पर्व के रूप में मनाकर जंगली जन-जीवन को आज के ग्लोबल वार्मिंग मानिंद खतरे से उबरने के लिए तैयार का रखा है जो उनके दूर दर्शिता को बरबस हीं दर्शाता है
न्यूज़ डेस्क, बगहा ब्यूरो
जगमोहन काजी
– अमिट लेख
बगहा, (ग्रामीण)। बगहा दो प्रखंड के अंतर्गत थरूहट क्षेत्र के लोगों द्वारा प्रकृति की रक्षा और हरियाली बचाने के लिए आदिवासी 48 घंटे का ग्रीन लॉकडाउन लगाते हैं। 400 वर्ष पुरानी यह प्रथा बरना पर्व के नाम से जानी जाती है। इस बार बरना पर्व 09 अक्टूबर को अमहट, अमवां, दरदरी अन्य गांवों में मनाया जा रहा है। इसके लिए मोहल्लेवार तैयारी शुरू कर दी गई है।
पेड़ पौधों से पत्तियों को तोड़ने पर अर्थदंड :
इस पर्व के माध्यम से आने वाली पीढ़ी को हरियाली बचाने का संकल्प और पुरानी परंपरा की सीख दी जाती है।

यादव महासभा के अध्यक्ष परमेश्वर यादव, मोहना का थारूओ से बहुत लगाव है। थारू के हर कल्चर को भली-भांति जानते हैं। उन्होंने बताया कि बरना पर्व के दौरान पेड़-पौधों और घास पत्तों को भी नहीं तोड़ा जाता है। जरूरत की चीजों को दो-तीन दिन पहले ही इकट्ठा कर लिया जाता है। सभी थारू-आदिवासी समुदाय से जुड़े गांओं में यह पर्व बारी-बारी से मनाया जाता है। मोहल्लेवार इसकी तारीख निर्धारित की जाती है। पर्व के दौरान कई बार लोग गलती में दातुन तोड़ लेते हैं, इस पर अंकुश लगाने के लिए अर्थदंड का प्रावधान भी है। 400, साल पुरानी परंपरा जंगल के समीप बसर करनेवाले भोले-भाले स्वाभाव के आदिवासी समुदाय आज भी निभाते आ रहे हैं। बुजुर्गो के अनुसार थारू 16वीं सदी में जंगल चले गए। उनके पूर्वजों ने वनसप्ती देवी और देवता की पूजा कर हरियाली बचाने का संकल्प लिया। यहीं से बरना शुरू हुआ, जो एक मायने में प्रकृति संरक्षण की दिशा में किया जानेवाला एक सामाजिक पहल है, जो पिछड़े या जंगली माने जानेवाले सकल आदिवासी समुदाय के विद्वता और दूर दृष्टि का परिचायक है। प्रकृति के कोपभाजन (आज का ग्लोबल वार्मिंग) से अपने समुदाय और जंगली जन जीवन को बचाये रखने की सोंच से आदिवासी लोग बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। जो आज के आधुनिक समाज के पिछड़े सोंच की एक मायने में असली सूरत को भी दर्शाता है।








