“राजनैतिक व्यंग्य समागम”
आलेख : विष्णु नागर
संकलन : जर्नलिस्ट अमरेश
दुनिया भर में एक प्रजाति पाई जाती है, जिसने मानवता के प्रति जघन्य से जघन्य अपराध किए हैं, मगर उसका कोई सदस्य इस पर कभी शर्मिंदा नहीं हुआ। उसने हत्याकांड किए, सामूहिक बलात्कार किए, चोरियां-डकैतियां डालीं, ठगी-जालसाजी की, झूठ पर झूठ के महल खड़े किए, एप्सटीनों से दोस्ती का हाथ बढ़ाया और उनके इशारों पर नाचे, नफ़रत के हथियार से लोगों को नोचा-खसोटा-मारा, झूठ के बड़े से बड़े हिमालय खड़े किए, फेक एनकाउंटर किए , घृणित से घृणित कई और भी काम किए, पर उन्हें शर्मिंदा करने का कोई प्रयास कभी सफल नहीं हुआ, क्योंकि उनके लिए यही देशभक्ति थी, यही धर्म की रक्षा का पुण्य कार्य था। 70 हजार से अधिक फिलीस्तीनियों के हत्यारे नेतन्याहू को शर्मिंदा नहीं किया जा सकता, जिसने भूख से बिलखते बच्चों, औरतों, बूढ़ों को ठीक उस समय गोलियों से भुनवाया, जब वे खाना लेने के लिए लाइन में खड़े थे। शिकारी पहले से तैयार थे। भूखे आएंगे और हम इन्हें मार डालेंगे। इनकी भूख-प्यास-सपने सबका स्थाई इलाज कर देंगे। इन्हें नेस्तनाबूद कर देंगे। जिसने अस्पतालों में इलाज के लिए गए मरीजों को मार डालने से गुरेज़ नहीं किया, जिस पर भ्रष्टाचार, जालसाजी, विश्वासघात के जुर्म आयद हैं, जिसे युद्ध अपराधी घोषित किया जा चुका है, जिसके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट है, वह पिछले गुरुवार को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में 77 देशों के उन प्रतिनिधियों को ‘नैतिक रूप से कायर’ बता रहा था, जिन्होंने उसका भाषण शुरू सुनने से इंकार कर दिया और विरोध में बाहर चले गए। वे गजा में उसके द्वारा मचाये गए हत्याकांड का विरोध दर्ज कर रहे थे। उससे यह बर्दाश्त नहीं।वह न्यूयार्क को भी तेल अवीव समझ रहा था। उस खड़ूस ने उनसे कहा कि तुम सब शर्म से डूब मरो। उसने न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी से भी उन्हीं के शहर में कहा, तुम भी डूबकर मर क्यों नहीं जाते! हत्यारों में इतना आत्मविश्वास आ चुका है। उन्होंने धर्म और नैतिकता पर उपदेश देना शुरू कर दिया है। हत्याकांडों का विरोध करनेवालों का वे मजा़क़ उड़ाने लगे हैं। आप निश्चिंत जानिए, वह जब प्रधानमंत्री नहीं रहेगा, तो भी शानदार जिंदगी जिएगा। खूब खाएगा, पिएगा, नाचेगा-कूदेगा।मोदी जी ने उसे सिखाया होगा, तो योग भी करेगा। अपने यहां ही देख लो, हत्यारे आसानी से बीमार नहीं पड़ते। मान लो कभी वह बीमार पड़ा, मरणासन्न हालत में आ गया, तो भी उसे दुनिया का बेहतरीन से बेहतरीन इलाज मिलेगा और वह फिर से उठ खड़ा होगा। उसका भी जनता को उल्लू बनाने का 2047 होगा, जब वह इजरायल को विश्व गुरु बना देगा! दुनिया के सारे हत्यारे दुनिया के किसी भी कोने में हों, जानते हैं कि मरने के बाद सभी हत्यारों को उस तरह मौत का सामना नहीं करना पड़ता, जिस तरह हिटलर और मुसोलिनी को करना पड़ा था।सबके शवों की वैसी दुर्दशा नहीं होती, जैसी मुसोलिनी की हुई थी। अधिकतर हत्यारे आराम से बिस्तर में डाक्टर की देखरेख में मरे हैं। मरने के बाद उन्हें किसी भी इनसान की तरह उनके धर्म के मुताबिक दफनाया या जलाया गया है। वे निश्चिंत हैं कि अगर कभी उनका अंत हुआ( उन्हें विश्वास है कि ऐसा कभी नहीं होगा), तो वह भी शानदार होगा।सारी दुनिया के नेता उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देंगे। इस दुनिया की तरह कोई और दुनिया अगर हुई, जहां मरने के बाद हिसाब-किताब होता है, तो वे वहां भी वे सब मैनेज कर लेंगे और मौज करेंगे। हो सकता है कि वहां भी फिलीस्तीनी हो, गजा हो और उन्हें तबाही मचाने का सुनहरा अवसर मिले! हिटलर और मुसोलिनी को शर्मिंदा करने वाले कम नहीं थे, मगर कोई जीते जी उन्हें शर्मिंदा नहीं कर सका। इराक को तबाह करनेवाले जार्ज डब्ल्यू बुश — जिसने सामूहिक जनसंहार के हथियारों के जखीरे रखने के झूठ के दम पर न केवल उसके शासक सद्दाम हुसैन को मरवा डाला, बल्कि पूरे इराक को तबाह करवा दिया था, आज अस्सी साल की उम्र में शांति और सुकून की जिंदगी जी रहा है। उसे शायद ही कोई अपराध बोध कभी हुआ हो। शायद ही कभी उसकी नींद ख़राब हुई हो! हो सकता है, वह पूरी तरह स्वस्थ हो और अपने पिता जार्ज एच डबल्यू बुश से भी लंबी उम्र पाए, जिसकी मौत 94 साल की उम्र में हुई थी! और हमारे यहां लोग सोचते हैं कि चुनाव आयोग के बारे में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपे खुलासे के बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और इनके दोनों आका शर्मिंदा हो गए होंगे, घबरा गये होंगे। बिलकुल नहीं। हो सकता है और दिनों की अपेक्षा इन्हें नींद ज्यादा अच्छी आई हो। हो सकता है कि ये तीनों उस शाम कहीं मिले हों और एक के हाथ में सिंगल माल्ट व्हिस्की और बाकी दो के गिलासों में गोमूत्र के जाम हों और तीनों ने गिलास टकराये हों, ठहाके लगाए हों कि ये हमसे इस्तीफा लेंगे, हमें जेल भिजवाएंगे, बेवकूफ! हो सकता है कि ज्ञानेश जी ने उस शाम चहककर कहा हो कि ये अखबार वाले सोच रहे होंगे कि हम अब तक शर्म से डूबकर मर चुके होंगे। पिघल कर बर्फ से पानी बन चुके होंगे। फिर तीनों हा-हा कर खूब हंसे होंगे। उस शाम ज्ञानेश जी ने जोश में आकर खुशी में दो की बजाय चार पैग लगाए होंगे और अंतिम पैग उन्होंने भी गोमूत्र ग्रहण किया हो। इसके बाद उन्होंने व्हिस्की की बोतल फेंक दी हो और कसम खाई हो कि आगे से वे भी गोमूत्र का सेवन करेंगे। गोमूत्र में जो बात है, वह सिंगल माल्ट में कहां! वैसे जब जीवन का उद्देश्य हिंदुत्व उर्फ सनातन की रक्षा करना हो, तो फिर कोई खतरा, खतरा नहीं लगता! वैसे भी कहा गया है कि प्यार और युद्ध में सब क्षम्य है और ज्ञानेश जी ने जो किया है, वह उनके लिए प्यार भी है और युद्ध भी! फ़र्क ये है कि सड़क पर बजरंग दल के गुंडे जो काम केसरिया पटका पहनकर करते हैं, वही काम उससे बेहतर ढंग से सूट-टाई और चश्मे पहनकर किया जा सकता है, यह ज्ञानेश कुमार जी ने सिद्ध करके दिखा दिया है। लोगों की गर्दन पर छुरा चलाए बगैर उनके नाम मतदाता सूची से हटाकर उन्हें बिना मारे भी मारा जा सकता है, यह बता दिया है। यह ऐसा गुनाह है, जिसमें खून से हाथ नहीं सनते और खून हो जाता है! ज्ञानेश जी को यह विश्वास अवश्य होगा कि 2047 तक तो नान-बायोलॉजिकल जी किसी न किसी तरह सिंहासन पर विराजमान रहेंगे ही, उसके बाद की परवाह क्या करना! हो सकता है अपना पत्ता इससे पहले कट जाए! पेट में पड़े मुर्गे पंख फड़फड़ा कर उड़ने को बेताब हो जाएं!

(कई पुरुस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर स्वतंत्र पत्रकार और साहित्यकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)







