बेतिया से उप-संपादक का चश्मा :
न्यूज़ डेस्क, ए.एल.न्यूज़
– अमिट लेख
बेतिया, (मोहन सिंह)। बौद्ध आस्था और भारत-जापान सांस्कृतिक संबंधों का अनोखा दृश्य उस समय देखने को मिला जब जापान से आए 15 बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों का दल ऐतिहासिक नंदनगढ़ स्तूप और अशोक स्तंभ पहुंचा। श्रद्धालु भिक्षुओं ने पूरे विधि-विधान और ध्यान के साथ भगवान बुद्ध का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना की।

दल ने सबसे पहले नंदनगढ़ स्तूप परिसर में प्रवेश कर उसे भगवान बुद्ध की पावन धरोहर मानते हुए साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। इसके बाद सभी ने स्तूप की परिक्रमा की और अपने साथ लाई गई बुद्ध प्रतिमा स्थापित कर लगभग डेढ़ घंटे तक जापानी भाषा में मंत्रोच्चार एवं ध्यान साधना की। वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक भाव से ओतप्रोत हो उठा। भिक्षु मॉन्क वैचो कुकाई ने द्विभाषीय एलबर्ट डैविड के माध्यम से बताया कि वे सभी शाक्यमुनि बुद्ध के अनुयायी हैं और उनके बताए मार्ग पर चलना ही उनके जीवन का उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि जापान में बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव है और वहां की संस्कृति एवं जीवनशैली में बुद्ध के सिद्धांतों की स्पष्ट झलक मिलती है। “भारत बुद्ध की जन्मभूमि है, इसलिए यहां आकर विशेष आत्मिक शांति की अनुभूति होती है,” उन्होंने कहा। एक अन्य भिक्षु सिलीरेन ने बताया कि उनका दल बोधगया और वैशाली की यात्रा करते हुए नंदनगढ़ पहुंचा है। यहां पूजा करने के बाद उन्हें गहन आत्मसंतोष प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि बुद्ध के प्रति जापान में अपार श्रद्धा है और लोग उन्हें जीवन का मार्गदर्शक मानते हैं। नंदनगढ़ में पूजा-अर्चना के पश्चात सभी भिक्षु ऐतिहासिक अशोक स्तंभ पहुंचे और वहां भी श्रद्धा सुमन अर्पित किए। इसके बाद उनका दल अगला पड़ाव कुशीनगर के लिए रवाना हो गया, जहां वे बुद्ध से जुड़ी पवित्र स्थली पर ध्यान साधना करेंगे। जापानी भिक्षुओं की इस यात्रा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भगवान बुद्ध की शिक्षाएं सीमाओं से परे हैं और विश्व के विभिन्न देशों को आध्यात्मिक सूत्र में जोड़ती हैं।








