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Post: चित्रित समाज पर विशिष्ट व्याख्यान का हुआ आयोजन

चित्रित समाज पर विशिष्ट व्याख्यान का हुआ आयोजन

हमारे विशेष ब्यूरो बिहार दिवाकर पाण्डेय की रिपोर्ट :

नव नालंदा महाबिहार सम विश्वविद्यालय नालंदा से पधारे हिंदी विभाग के प्रो. रविंद्र नाथ श्रीवास्तव परिचय दास ने अपने उद्बोधन में कहा कि लोक साहित्य हमारे जीवन में सदैव उपस्थित होता है

न्यूज डेस्क, राजधानी पटना

दिवाकर पाण्डेय

– अमिट लेख
मोतिहारी, (विशेष ब्यूरो)। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग द्वारा गांधी भवन परिसर स्थित नारायणी कक्ष में लोक साहित्य में चित्रित समाज पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में नव नालंदा महाबिहार सम विश्वविद्यालय नालंदा से पधारे हिंदी विभाग के प्रो. रविंद्र नाथ श्रीवास्तव परिचय दास ने अपने उद्बोधन में कहा कि लोक साहित्य हमारे जीवन में सदैव उपस्थित होता है। समकालीन समय में लोक का चिंतन बदल गया है। लोक मौखिकता की मानोगति है क्योंकि लोक की रचना व्यक्ति नहीं समाज करता है। उसका मूल्य समाजगत है। लोकगायन में एक निश्चित कथा विन्यास होता है। इसलिए लोक गाथाकार कहता है की कथा नष्ट नहीं होती। यह लोकगाथा का मर्म है। हमारे समाज में शिव समाज के सबसे अच्छे बिम्ब है। समाज को जोड़ने का सबसे सुंदर साधन लोक है, यह जीवन का एकीकरण है। लोक जीवन में सबसे बड़ा महत्व स्मृति का है। इससे हम अपने जीवन में बने रहते हैं। मानवीकरण रचनात्मक साहित्य से कहीं अधिक इस लोक में उपस्थित होता है क्योंकि यहां मौखिकता की परंपरा पर बल होता है। जिसके कारण यह टिकाऊ होता है। आज समय बदला है। बाजार में हम वह लेते है। जिसकी आवश्यकता हमको नहीं है। ज्ञान सूचनाओं में बदल गया है इससे जीवन भी सूचना में रूपांतरित हो गया है। भावना का स्थान सूचना ने ले लिया है। लोक साहित्य कई साहित्य का संकुल है। लोक साहित्य एक गंभीर विमर्श है इस लिए प्रत्येक विश्वविद्यालय में एक लोक अध्ययन विभाग होना चाहिए। धर्म बदलने से संस्कृति नहीं बदलती इसका प्रमाण आप इंडोनेशिया में होने वाले रामलीला के मंचन को देख सकते हैं। लोक जीवन में भरोसा है, यह विश्वासों की धरती है। लोक जीवन बिखरा हुआ है उसे नए जीवन दृष्टि से देखने की आवश्यकता है।

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