“राजनैतिक व्यंग्य समागम”
आलेख : राजेंद्र शर्मा
संकलन : जर्नलिस्ट अमरेश
बुजुर्गों ने सही कहा है — दो टके की हांडी गयी, पर कुत्ते की जात पहचानी गयी। इंडिया की पब्लिक तो जो थी सो थी, पर भारत वाली प्रजा भी बड़ी तोता चश्म निकली। आखिरकार, पूरे पच्चीस साल की सेवा के लिए मोदी जी ने ऐसा क्या मांग लिया था, जो इस नाशुक्री प्रजा से नहीं दिया गया। फकत एक दिया ही तो मांगा था — आशीर्वाद का दिया ; पर वह भी इस प्रजा से दिया नहीं गया। अरे पच्चीस साल की सेवा का न सही, छिहत्तर साल की उम्र का तो ख्याल किया होता। इसका भी नहीं, तो कम से कम इसका ख्याल किया होता कि सारे के सारे मंत्री, संतरी, संपदा-निर्माता, फिल्मी सितारे, आला अफसर भी तो, आशीर्वाद का दिया न सिर्फ खुद जला रहे थे, बल्कि कोंच-कोंच कर दूसरों से भी जलवा रहे थे। दर्जनों मुख्यमंत्री पूरी की पूरी सरकारों को दिये जलवाने से लेकर हवन कराने तक में लगा रहे थे। लाखों, करोड़ों की तादाद में दिए जलवा रहे थे, तेल फुंकवा रहे थे। भेड़ चाल लग रही थी तो भेड़ चाल ही सही, एक दिया ही तो जलाना था। मुश्किल से पांच रुपए की दीया-बाती और पांच रुपए का तेल। कुल दस रुपए का खर्चा था। सिर्फ उतना जितना कि पान खाकर उगल देते हैं या सिगरेट पीकर धुंए में उड़ा देते हैं। शायद उससे भी कम। शायद यूपीआई से हर सौदे पर पड़ने वाले खर्चे जितना ही। पर इन्हें तो नक्कू बनना था। दिया नहीं जलाया। आशीर्वाद का दिया वाले टैस्ट में बाकी सब पास हो गए, बस एक निगोड़ी प्रजा ही फेल हो गयी। फेल भी ऐसे-वैसे नहीं, बहुत बुरी तरह से। कोई-कोई तो कह रहा है कि टैस्ट में अंडा आया है, अंडा। पब्लिक होने के गुमान में पट्ठी पब्लिक टैस्ट देने पहुंची ही नहीं। सरकारी आशीर्वाद के दिए तो करोड़ों जले, धन्नासेठों के आशीर्वाद के भी दिए खूब ही जले होंगे, बस पब्लिक के ही आशीर्वाद के दिए नहीं दिखाई दिए — न शहरों में, गांवों में, न बाजारों में, न मोहल्लों में ; अंकिलों वाली सोसाइटियों में भी नहीं। और तो और, महलों में भी नहीं। और यह तो तब है, जबकि प्रजा के पास कम से कम इस तरह की नासमझी का बहाना नहीं था कि उसकी समझ में ही नहीं आया कि क्या करना था और कैसे? क्या इसी दिन के लिए उसे ताली-थाली बजाने से लेकर दीये-टार्च जलाने तक की प्रैक्टिस नहीं करायी गयी थी। माना कि वह कोरोना के टैम की बात थी, लेकिन प्रैक्टिस तो थाली-बर्तन बजाने और दीया-बाती करने की ही करायी गयी थी। एक दिया ही तो जलाना था। अब ये बहानेबाजी तो किसी को भी हजम नहीं होगी कि वह सब लोगों को भूल-भाल गया। कोरोना की बात इतनी पुरानी भी नहीं है कि उस टैम में जो सीखा था, लोग भूल गए होंगे। अस्सी करोड़ को महीने का पांच किलो राशन मुफ्त देना मोदी जी तो कोरोना के इतने साल बाद भी नहीं भूले, फिर पब्लिक बदले में आशीर्वाद का एक दिया जलाना कैसे भूल गयी — ये क्या विश्वास करने वाली बात है!और हद्द तो यह है कि आशीर्वाद का दिया नहीं जलाया तो नहीं जलाया, ऊपर से तरह-तरह के बहाने बनाकर कटे पर नमक और छिडक़ रहे हैं। कहते हैं कि मोदी जी के जन्म की दो-दो तारीखें हैं, दो-दो साल हैं, वह सब तो फिर भी ठीक है, पर पहले इसका तो फैसला हो जाए कि वाकई उनका जन्म भी हुआ था या नहींï? 2024 के चुनाव के टैम पर तो मोदी जी ने खुद ही बताया था कि पहले उन्हें यह भ्रम था कि बाकी लोगों की तरह शायद उनका भी जन्म हुआ था, लेकिन दस साल प्रधानमंत्री रहने के बाद उन्हें पक्का हो गया था कि उनका जन्म नहीं, अवतरण हुआ था। दो-ढाई साल में ही अवतार से जन्म की ओर दोबारा पल्टी क्यों? मगर ये सब दिमागी नक्सलों की फैलाई झूठी दलीलें हैं। वो क्या समझते हैं कि मोदी जी जन्मदिन के आशीर्वाद के लिए, अवतार होने का अपना दावा छोड़ देंगे? हिंदू परंपरा में जन्म और अवतार का आपस में कोई विरोध है ही नहीं, ये सब विदेशी दिमागों की उपज हैं। राम हों, कृष्ण हों, शिव हों, हमारे तो सारे ही देवताओं के जन्म दिन मनाए जाते हैं और सब के सब अवतार तो खैर हैं ही। फिर, मोदी जी भी एक साथ अवतारी और जन्म दिन वाले क्यों नहीं हो सकते हैं? एक और बहाना यह है कि इस वक्त हम पर दु:ख पड़ा है, जन्मदिन की खुशी कैसे मनाएं? बिहार में लाखों बाढ़ की चपेट में हैं, जिनको खाने के लाले हैं। मध्य प्रदेश में कहीं ढाई दर्जन आदिवासी बच्चे भूख से मरे हैं, तो कहीं दर्जनों लोग जहरीली शराब पीकर मरे हैं। और तो और, राजधानी दिल्ली में सत्य निकेतन में पीजी रिहाइश की इमारत में दबकर दिल्ली विश्वविद्यालय में पढऩे वाले सात छात्र दस रोज पहले ही मरे हैं। हम सोग मना रहे हैं, जन्मदिन का जश्न कैसे मनाएं? हमारे घरों में अंधेरा है, दरवाजे पर दीप कैसे जलाएं? पर सोग मनाने से मोदी जी ने कभी किसी को रोका है क्या? सोग मनाने के लिए पूरा साल पड़ा है, जी भर कर मनाएं। बस, एक दिन मांगा है, जश्न के लिए। जश्न का एक दिन भी मोदी जी कोई अपने लिए नहीं मांग रहे हैं, देश के लिए ही मांग रहे हैं। एक दिन भी जश्न नहीं मनाएंगे, तब तो भारत वाले खुश होना ही भूल जाएंगे। देखा नहीं, कैसे ताजा वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में भारत, 116वें नंबर पर पहुंच गया है, पाकिस्तान से भी 12 नंबर नीचे। कोई भारत-विरोधी ही होगा, जो इसके बाद भी एक दिन के जश्न में भी अड़ंगा लगाएगा। भारतीयों के लिए भी खुशी का कम से कम एक दिन तो होना ही चाहिए! और एक बहाना यह भी है कि छियत्तरवां हो या सतहत्तरवां, मोदी जी के जन्मदिन का जश्न तो निजी जश्न होना चाहिए। जन्मदिन का जश्न मोदी पार्टी की सरकारें क्यों मना रही हैं? करोड़ों दियों में, करोड़ों का तेल फूंक कर, दिवाली से पहले हजारों करोड़ की दिवाली क्यों मना रही हैं? पर इस बहाने में झूठ के साथ कपट भी है। देख लिया ना, मोदी जी अगर निजी दियों के भरोसे ही रहते, तब तो उनके जन्मदिन पर नासा की फोटो में भारत में अंधियारा ही दिखाई देता। बिहार में तस्वीर पर माला डालकर उसके आगे दीपक जला ही दिए, शोक का अंधेरा और हो जाता! यह कोई नहीं भूले कि मोदी जी ने जन्म दिन मनाने का टास्क दिया था। और निजी हो या सरकारी, जश्न तो जश्न होता है। निजी और सरकारी का भेद भी दिमागी नक्सलों की ही करतूत है। राजा का जन्म दिन तो निजी होकर भी सरकारी होता है और सरकारी होकर भी निजी। और राजा ईश्वर का अंश तो होता ही है, बस कोई-कोई बाकायदा नॉन-बायोलॉजिकल भी होता है। बाकायदा अवतार के जन्म की खुशी मनाने के लिए, दो-चार हजार करोड़ रुपये खर्च करने को, घर फूंक तमाशा देखना कहना चाहिए क्या? खैर! 17 सितंबर के आशीर्वाद का दिया टैस्ट के बाद, पब्लिक ने मोदी जी का विश्वास खो दिया है। ज्ञानेश गुप्ता को चाहिए कि जनता को भंग कर दें और एसआइआर के जरिए मोदी जी के लिए एक नयी जनता चुन लें। अगली 17 सिंतबर को आशीर्वाद का दिया टैस्ट में पब्लिक को फेल नहीं होने दिया जा सकता है।

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और लोकलहर के संपादक हैं।)







