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Post: SBI का बीजेपी से हुआ गठबंधन, दोनों मिलकर छिपाने में लगे हैं चुनावी बॉन्ड की जानकारी : विधायक

SBI का बीजेपी से हुआ गठबंधन, दोनों मिलकर छिपाने में लगे हैं चुनावी बॉन्ड की जानकारी : विधायक

हमारे उप-संपादक मोहन सिंह की कलम से :

मोदी जी बताये किन किन लोगों से लिया चुनावी बाॅन्ड और उसके बदले में कितना दिया राष्ट्रीय सम्पत्ति : वीरेन्द्र प्रसाद गुप्ता

न्यूज़ डेस्क, जिला पश्चिम चम्पारण

मोहन सिंह

– अमिट लेख

बेतिया, (विशेष खबर)। पीएम मोदी जी के पश्चिम चम्पारण आगमन पर भाकपा माले केन्द्रीय कमिटी सदस्य सह सिकटा विधायक वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता ने पीएम मोदी जी से सवाल उठाते हुए पुछा है की बताये किन-किन पुजींपतियों से कितना चुनावी बाॅन्ड से रूपये लिए है, और उसके बदले में जनता के टेक्स के रूपये से निर्मित राष्ट्रीय सम्पत्ति को अपने मित्र पुजींपतियों के नाम लूटाने का काम किया। बताते चले की सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना के तहत राजनीतिक दलों को प्राप्त चंदे का खुलासा करने के निर्देश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) को निर्देश दिये थे की वो चुनावी चंदे से संबंधित संपूर्ण जानकारी 6 मार्च 2024 (लोकसभा चुनाव के पूर्व) के पहले सार्वजनिक करते हुए चुनाव आयोग को सौंपे। एक दिन पहले ही स्टेट बैंक ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आवेदन देकर जानकारी साझा करने के लिए 30 जून तक का समय माँग लिया, यानि लोकसभा चुनाव की सभी प्रक्रिया बीत जाने के बाद। इस घटना क्रम पर माले विधायक वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता ने कहा कि लगता है बीजेपी और मोदी सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक पर जानकारी साझा नहीं करने का दबाव बनाया।

माले विधायक वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता ने कहा कि इन सवालों का जवाब कौन देगा :

देश के सबसे बड़े पूर्णतः कम्प्यूटरीकृत बैंक को इलेक्टोरल बॉंड की जानकारी देने के लिये 5 माह का समय क्यों चाहिए ? जबकि संपूर्ण जानकारी एक क्लिक से 5 मिनट में निकाली जा सकती है।
स्टेट बैंक ने जानकारी देने के लिये और समय की माँग जानकारी देने की अंतिम तिथि के एक दिन पहले ही क्यों की ? क्या कितना समय लगेगा इसकी गणना करने के लिये भी एक माह का समय लग गया ? 48 करोड़ अकाउंट, 66 हज़ार एटीएम और 23 हज़ार ब्रांच संचालित करने वाली SBI को केवल 22217 इलेक्टोरल बॉंड की जानकारी देने के लिये 5 महीने का समय चाहिए? सवाल उठता है कि क्या देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक भी अब बीजेपी सरकार की आर्थिक अनियमितता और कालेधन के स्रोत को छिपाने का ज़रिया बन रहा है। सवाल उठता है कि क्या एक राजनीतिक दल और एक सरकारी बैंक मिलकर देश की उच्चतम अदालत के फ़ैसले को ठेंगा दिखा रहे हैं। भारत की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी की इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देते हुये इसे रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना के तहत राजनीतिक दलों को प्राप्त चंदे का खुलासा करने के निर्देश दिये थे। सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) को निर्देश दिये थे की वो चुनावी चंदे से संबंधित संपूर्ण जानकारी 6 मार्च 2024 (लोकसभा चुनाव के पूर्व) के पहले सार्वजनिक करते हुए चुनाव आयोग को सौंपे। वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता ने कहा कि सत्ताधारी बीजेपी, जो कि चुनावी बॉन्ड योजना की इकलौती सबसे बड़ी लाभार्थी है, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद से बेचैन थी। बीजेपी को डर था कि उसके चंदा देने वाले मित्रों की जानकारी सार्वजनिक होते ही बीजेपी की बेईमानी का सारा भंडाफोड़ हो जायेगा। चंदा कौन दे रहा था, उसके बदले उसको क्या मिला, उनके फ़ायदे के लिए कौन से क़ानून बनाये गये, क्या चंदा देने वालों के ख़िलाफ़ जाँच बंद की गयीं, क्या चंदा लेने के लिए जाँच की धमकी दी गयीं, यह सब पता चल जाएगा।

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