छपरा से हमारे उप-संपादक का संकलन :
श्रद्धालुओं द्वारा इस मूर्ति को राम-जानकी सह हनुमान मंदिर परिसर में पुजारी के संरक्षण में रखवाया गया है
न्यूज़ डेस्क, ए.एल.न्यूज़
– अमिट लेख, संवाददाता
एकमा, (सारण)। जिले के एकमा प्रखंड के आमडाढ़ी पंचायत के देकुली गांव में तालाब की सफाई के दौरान एक प्राचीन पत्थर की प्रतिमा मिलने से क्षेत्र में उत्सुकता और चर्चा का माहौल है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह खोज इलाके के गौरवशाली अतीत और संभावित ऐतिहासिक महत्व की ओर संकेत करती है।

बहरहाल, इस मूर्ति को पहले यहां स्थित ब्रह्म बाबा के पास रखकर पूजा अर्चना शुरू कर दी गई। इसके बाद आमडाढ़ी गांव के श्रद्धालुओं द्वारा इस मूर्ति को राम-जानकी सह हनुमान मंदिर परिसर में पुजारी के संरक्षण में रखवाया गया है। वहीं आमडाढ़ी के सैनिक परिवार की ओर से इसी मंदिर परिसर में आगामी 26 मई को विशाल भंडारा आयोजित किया जाएगा। बताया जाता है कि देकुली स्थित राम जानकी मंदिर के समीप पोखरा की सफाई और मिट्टी हटाने के दौरान मंदिर के पुजारी की नजर इस प्राचीन प्रतिमा पर पड़ी।

मिट्टी हटने के बाद प्रतिमा स्पष्ट रूप से दिखाई दी, जिसके बाद ग्रामीणों की भीड़ जुट गई। फिलहाल स्थानीय लोगों ने प्रतिमा को समीप स्थित ब्रह्म बाबा के स्थान पर सुरक्षित रखकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार यह पूरा क्षेत्र लंबे समय से ऐतिहासिक महत्व से जुड़ा माना जाता रहा है। यहां दलका चंवर, राजा दल का पोखरा और राजा दल की कचहरी आदि जैसे स्थान आज भी प्रचलित नामों से जाने जाते हैं, जो किसी पुराने स्थानीय शासन व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि ब्रह्म बाबा का स्थान भी ऊंचे टीले जैसा है, जहां एक विशाल और अत्यंत पुराना पीपल का पेड़ स्थित है। मुखिया प्रतिनिधि भरत सिंह, बीडीसी प्रतिनिधि सुरेंद्रनाथ पंडित, पूर्व मुखिया ओमप्रकाश सिंह, ज्योतिषाचार्य आशीष कुमार पांडेय, अनिल कुमार सिंह, चंद्रमणि सिंह, कमल सिंह सेंगर, विजय कुमार सिंह, मदन राम, नवल किशोर राम शिक्षिका प्रियंका द्विवेदी, सामाजिक कार्यकर्ता चंदन श्रीवास्तव आदि अन्य ग्रामीणों के अनुसार इस ऊंचे स्थान और आसपास के क्षेत्रों में जब-जब खुदाई होती है, तब बड़ी-बड़ी प्राचीन ईंटें निकलती रही हैं, जिससे यहां किसी पुराने निर्माण, गढ़ या धार्मिक स्थल के अवशेष होने की संभावना जताई जा रही है। बताते हैं कि परसागढ़ नाम भी श्रैत्रीय इतिहास में किसी किलेबंद या संगठित बसावट की ओर संकेत करता है।
प्रारंभिक तौर पर प्रतिमा की बनावट, काले पत्थर पर की गई नक्काशी और शिल्प शैली इसे प्राचीन काल की महत्वपूर्ण कलाकृति होने की संभावना की ओर इंगित करती है। हालांकि इसकी वास्तविक आयु, कालखंड और ऐतिहासिक महत्व का निर्धारण विशेषज्ञ जांच के बाद ही संभव होगा। स्थानीय बुद्धिजीवियों और ग्रामीणों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा बिहार पुरातत्व विभाग से इस प्रतिमा की जांच कराने की मांग की है। लोगों का मानना है कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण और ऐतिहासिक अध्ययन से क्षेत्र के अतीत से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। फिलहाल प्रतिमा के संरक्षण और सुरक्षा को सबसे जरूरी माना जा रहा है, ताकि संभावित ऐतिहासिक धरोहर को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे।








