रिपोर्ट : न्यूज़ ब्यूरो, इंडो-नेपाल बॉर्डर
60–70 साल पुराने आशियानों पर मंडराया उजड़ने का खतरा
सरकार से ग्रामीणों की दो टूक अपील—“हम जाएँ तो जाएँ कहाँ? नया आशियाना मिलने के बाद ही हटाया जाए
न्यूज़ डेस्क, ए.एल.न्यूज़
– अमिट लेख
वाल्मीकिनगर/बगहा, (संतोष कुमार)। तिरहुत नहर अवर प्रमंडल, बगहा की ओर से जारी एक नोटिस के बाद नहर बांध एवं नदी किनारे बसे ग्रामीणों में चिंता और आक्रोश का माहौल है। विभाग की ओर से जारी नोटिस संख्या 166/बगहा, दिनांक 23 अगस्त 2026 में तिरहुत मुख्य नहर के किलोमीटर 0.0 से 6.7 तक नहर बांध पर किए गए कथित अतिक्रमण को हटाने का निर्देश दिया गया है। नोटिस में ग्रामीणों से कहा गया है कि वे तीन दिनों के अंदर स्वेच्छा से नहर के अधीन भूमि पर बने कच्चे-पक्के मकान, झोपड़ी, चापाकल, शौचालय, दुकान आदि को हटा लें। नोटिस में यह भी चेतावनी दी गई है कि निर्धारित अवधि के बाद जल संसाधन विभाग द्वारा अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा सकती है और इस प्रक्रिया में होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी संबंधित लोगों की होगी।
“साहब, हम लगभग 60–70 साल से यहीं रह रहे हैं…”
नोटिस सामने आने के बाद ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से नहर बांध और नदी किनारे रहकर अपना जीवन गुजार रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, कई परिवारों की कई पीढ़ियां यहीं गुजर गईं और आज उनके पास रहने के लिए दूसरी जमीन नहीं है।
ग्रामीणों का सवाल है—“अगर हमारा घर हटा दिया गया तो हम अपने बच्चों और परिवार को लेकर कहाँ जाएंगे?”
ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास या सरकारी कार्रवाई के विरोधी नहीं हैं, लेकिन कार्रवाई से पहले सरकार उन्हें रहने के लिए जमीन और नया आशियाना उपलब्ध कराए। उनका कहना है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के घर उजाड़े गए तो कई परिवार खुले आसमान के नीचे आने को मजबूर हो सकते हैं।
ग्रामीणों की सरकार से एक ही मांग
ग्रामीणों ने सरकार और प्रशासन से भावुक अपील करते हुए कहा है कि -“पहले हमें रहने के लिए जमीन दी जाए, हमारे लिए नया आशियाना उपलब्ध कराया जाए और उसके बाद ही किसी प्रकार की हटाने की कार्रवाई की जाए।” ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से यहां रह रहे हैं और अचानक आशियाना छिन जाने की स्थिति में उनके सामने सबसे बड़ा सवाल पुनर्वास और रहने की जगह का होगा। नोटिस के बाद इलाके में चर्चाओं का दौर तेज है। ग्रामीणों में यह भी मांग उठ रही है कि प्रशासन मौके पर पहुंचकर प्रभावित परिवारों की वास्तविक स्थिति का सर्वे करे और जिन परिवारों के पास रहने के लिए अन्य जमीन नहीं है, उनके लिए मानवीय आधार पर पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। अब देखना यह है कि ग्रामीणों की इस गुहार पर सरकार और प्रशासन क्या कदम उठाता है। फिलहाल ग्रामीणों की आवाज एक ही है— “हमें उजाड़ने से पहले हमारा नया आशियाना बसाइए, क्योंकि जमीन के बिना हम आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ?”








