एक नज़र थरूहट पर :
थरूहट क्षेत्र एक ऐसी जनजाति को अपने आंचल में सदियों से पालते-पोषते आ रहा है, जो पूर्णतः प्रकृति प्रेमी, निश्चल, निष्कपट, निर्भीक तथा स्वाभिमानी स्वभाव के हैं
न्यूज़ डेस्क, ए.एल.न्यूज़
– अमिट लेख
बेतिया, (मोहन सिंह)। आइए एक नजर डालते हैं थारू जनजाति पर। भारत-नेपाल के तराइ, जंगलों-पहाड़ों से आच्छादित थरूहट क्षेत्र एक ऐसी जनजाति को अपने आंचल में सदियों से पालते-पोषते आ रहा है, जो पूर्णतः प्रकृति प्रेमी, निश्चल, निष्कपट, निर्भीक तथा स्वाभिमानी स्वभाव के हैं। ऐसे व्यक्तित्व वाली जाती थारू है। बिहार प्रांत के पश्चिम चंपारण जिले में वाल्मीकिनगर से मैनाटांड़ तक बगहा – 2 (सिधांव), रामनगर, गौनाहा तथा मैनाटांड़ अंचलों के तराई क्षेत्रों में लगभग 800 वर्ग मिल क्षेत्रफल में इनका वास है, इसे कहते हैं थरूहट। थारू उतर प्रदेश, उत्तराखण्ड तथा नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या निवास करते हैं।

अपने विशिष्ट भाषा, वेशभूषा, खानपान, आतिथ्य सत्कार, स्वाभिमानी, स्वभाव तथा समृद्ध कलाकृति आदि के लिए थारू एक अलग पहचान बनाए हुए हैं। छल प्रपंच, केस मुकदमा से ये अपने को दूर रहना ही पसंद करते हैं। थारूओ का वनो से अटूट रिसता रहा है। सदियों से वनों पर ही आधारित रहें हैं। इसलिए यह कहा जाए कि वन ही थारूओ का जीवन है तो इसमे कोई अतिशयोक्ति नहीं है। जितना ही ये वनो से लाभान्वित होते हैं उतना ही उसकी हिफाजत भी करते हैं। राजनीतिक स्तर पर थारू काफी पिछड़े हुए हैं। इनमे राजनीतिक चेतना का घोर अभाव है, जिसका सीधा असर इनके सामाजिक स्तर पर पड़ रहा है। थारूओ के मन में भी जिज्ञासा जगी और इसी जिज्ञासा ने वाल्मीकिनगर से मैनाटांड़ तक थारूओ मे एक संग़ठन की भावना जागृत कर दी। अंततः थरूहट के छ: तपाओं के थारूओ ने मिलकर 19 मार्च 1971 को थारूओ के पवित्र धाम सुभद्रा स्थान मे एक विशाल संगठन का मूर्त रूप दे दिए, जिसका नाम भारतीय थारू कल्याण महासंघ घोषित किया गया। इस संगठन के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय प्रेम नारायण गढ़वाल, उपाध्यक्ष स्वर्गीय धवला खतइत, महामंत्री स्वर्गीय देवलाल महतो, उप महामंत्री स्वर्गीय लक्ष्मण प्रसाद तथा कोषाध्यक्ष स्वर्गीय राजेश्वर प्रसाद निर्वाचित किए गए।
थारू को जनजाति की घोषणा :
थारूओ के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि उनका अनुसूचित जनजाति में सम्मिलित होना कहा जा सकता है ।भारतिय थारू कल्याण महासंघ के संगठन का एक प्रधान उद्देश्य बिहार के थारूओ को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में सम्मिलित कराना भी था। इसके लिए महासंघ ने एक लंबी लड़ाई लड़ी। तीन दशक से अधिक अवधि के अथक प्रयास से 8 जनवरी 2003 को थारूओ को सफ़लता प्राप्त हो सकी। तदुपरांत बिहार के थारू भी भारत का राजपत्र असाधारण भाग – 2, खण्ड – 1 बिहार क्रमांक 33 के आधार पर अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में सूचीबद्ध हो गए ।








